एकादशी व्रत से पहले जान लें सही तिथि, पूजन और श्राद्ध के उत्तम मुहूर्त
हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पूजन का विधान है। पंचांग के अनुसार, हर महीने दो एकादशी तिथि आती हैं (एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष)। इस समय पितृ पक्ष चल रहा है जिसकी अवधि 16 दिनों की होती है। इस अवधि में एकादशी व्रत भी रखा जाता है। पितृ पक्ष का एकादशी व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में आता है। इस एकादशी का नाम है-इंदिरा एकादशी। मान्यता है कि इंदिरा एकादशी व्रत करने से व्रतधारी के पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा से पापों से मुक्ति मिलना सम्भव है। पितृ पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत रखने के साथ ही पितरों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का भी विधान है।
आइये जानते है इस वर्ष पितृपक्ष में एकादशी व्रत कब रखा जाएगा और तर्पण और श्राद्ध के शुभ मुहूर्त क्या है?
पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी व्रत कब है:
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की शुरुआत 5 अक्टूबर, सोमवार को मध्यरात्रि के बाद 2 बजकर 8 मिनट पर होगी, यानी 6 अक्टूबर, मंगलवार को सूर्योदय से पहले ही एकादशी तिथि लग जाएगी। वहीं, रात में 12 बजकर 35 मिनट तक एकादशी तिथि व्याप्त रहेगी। 6 अक्टूबर को सूर्योदय से पूर्व ही एकादशी लग जा रही है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी का व्रत करना शास्त्र सम्मत होगा।
इंदिरा एकादशी पूजन और दान के शुभ मुहूर्त:
एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन गरीब और जरूरतमंद की सेवा या दान करना भी अति उत्तम माना जाता है।
इंदिरा एकादशी सुबह-शाम पूजा का शुभ मुहूर्त
सुबह का लाभ चौघड़िया : सुबह 10 बजकर 40 मिनट से लेकर 12 बजकर 9 मिनट तक
शुभ चौघड़िया : दोपहर के 3 बजकर 5 मिनट से लेकर 4 बजकर 33 मिनट तक
शाम का लाभ चौघड़िया : शाम को 7 बजकर 33 मिनट से लेकर 9 बजकर 5 मिनट तक
इंदिरा एकादशी पूजा विधि
मान्यता है कि दशमी तिथि के दिन व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। फिर, अगले दिन इंदिरा एकादशी तिथि को सुबह सूर्योदय से पूर्व उठ जाएं।
दशमी तिथि को ब्राह्मण, गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का प्रबंध करें। साथ ही, इस दिन सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
स्नानादि करके साफ वस्त्र धारण करें और सबसे पहले मन में श्रीहरि का स्मरण करके व्रत का संकल्प लें। इसके बाद, पूजा घर साफ करें।
मंदिर में एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें।
श्रीहरि और देवी लक्ष्मी को नए वस्त्र अर्पित करें। साथ ही, ताजे पुष्प, माला, धूप-दीप आदि भी अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।
भगवान को भोग लगाने के बाद इंदिरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और फिर, विधि-पूर्वक पूजन आरती करें।
इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व:
विष्णु पुराण के अनुसार, इंदिरा एकादशी व्रत करने से मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और इस व्रत के पुण्य प्रभाव से यमलोक में कष्ट भोग रहे पितरों को वैकुंठ की प्राप्ति होती है।
एकादशी तिथि पर किन पितरों का किया जाता है श्राद्ध:
इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। इसके अलावा इस तिथि पर संन्यासी या वैरागी जीवन जीने वाले पितरों का भी श्राद्ध करने की परंपरा है।
एकादशी पर श्राद्ध के मुहूर्त 2026:
कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 01:20 बजे से दोपहर 03:40 बजे तक
इंदिरा एकादशी व्रत कथा
कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए।
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अधोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है।
प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।
सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो।
मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।
इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।
हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।
रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।
नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया।
हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा। इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाते हैं और सब प्रकार के भोगों को भोगकर बैकुंठ को प्राप्त होते हैं।