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Kartik month 2026 कार्तिक मास – अध्यात्म की दृष्टि से

Indira Ekadashi-2026-Pitru Paksha-Shradh Paksha

एकादशी व्रत से पहले जान लें सही तिथि, पूजन और श्राद्ध के उत्तम मुहूर्त

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पूजन का विधान है। पंचांग के अनुसार, हर महीने दो एकादशी तिथि आती हैं (एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष)। इस समय पितृ पक्ष चल रहा है जिसकी अवधि 16 दिनों की होती है। इस अवधि में एकादशी व्रत भी रखा जाता है। पितृ पक्ष का एकादशी व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में आता है। इस एकादशी का नाम है-इंदिरा एकादशी। मान्यता है कि इंदिरा एकादशी व्रत करने से व्रतधारी के पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा से पापों से मुक्ति मिलना सम्भव है। पितृ पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत रखने के साथ ही पितरों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का भी विधान है।

आइये जानते है इस वर्ष पितृपक्ष में एकादशी व्रत कब रखा जाएगा और तर्पण और श्राद्ध के शुभ मुहूर्त क्या है?

पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी व्रत कब है:
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की शुरुआत 5 अक्टूबर, सोमवार को मध्यरात्रि के बाद 2 बजकर 8 मिनट पर होगी, यानी 6 अक्टूबर, मंगलवार को सूर्योदय से पहले ही एकादशी तिथि लग जाएगी। वहीं, रात में 12 बजकर 35 मिनट तक एकादशी तिथि व्याप्त रहेगी। 6 अक्टूबर को सूर्योदय से पूर्व ही एकादशी लग जा रही है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी का व्रत करना शास्त्र सम्मत होगा।

इंदिरा एकादशी पूजन और दान के शुभ मुहूर्त:
एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन गरीब और जरूरतमंद की सेवा या दान करना भी अति उत्तम माना जाता है।

इंदिरा एकादशी सुबह-शाम पूजा का शुभ मुहूर्त

सुबह का लाभ चौघड़िया : सुबह 10 बजकर 40 मिनट से लेकर 12 बजकर 9 मिनट तक
शुभ चौघड़िया : दोपहर के 3 बजकर 5 मिनट से लेकर 4 बजकर 33 मिनट तक
शाम का लाभ चौघड़िया : शाम को 7 बजकर 33 मिनट से लेकर 9 बजकर 5 मिनट तक

इंदिरा एकादशी पूजा विधि
मान्यता है कि दशमी तिथि के दिन व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। फिर, अगले दिन इंदिरा एकादशी तिथि को सुबह सूर्योदय से पूर्व उठ जाएं।
दशमी तिथि को ब्राह्मण, गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का प्रबंध करें। साथ ही, इस दिन सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
स्नानादि करके साफ वस्त्र धारण करें और सबसे पहले मन में श्रीहरि का स्मरण करके व्रत का संकल्प लें। इसके बाद, पूजा घर साफ करें।
मंदिर में एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें।
श्रीहरि और देवी लक्ष्मी को नए वस्त्र अर्पित करें। साथ ही, ताजे पुष्प, माला, धूप-दीप आदि भी अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।
भगवान को भोग लगाने के बाद इंदिरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और फिर, विधि-पूर्वक पूजन आरती करें।

इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व:
विष्णु पुराण के अनुसार, इंदिरा एकादशी व्रत करने से मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और इस व्रत के पुण्य प्रभाव से यमलोक में कष्ट भोग रहे पितरों को वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

एकादशी तिथि पर किन पितरों का किया जाता है श्राद्ध:
इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। इसके अलावा इस तिथि पर संन्यासी या वैरागी जीवन जीने वाले पितरों का भी श्राद्ध करने की परंपरा है।

एकादशी पर श्राद्ध के मुहूर्त 2026:
कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 01:20 बजे से दोपहर 03:40 बजे तक

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए। 
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अ‍धोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है।

प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।

सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो।

मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।

इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।

हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।

रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।

नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया।

हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा। इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाते हैं और सब प्रकार के भोगों को भोगकर बैकुंठ को प्राप्त होते हैं।

When is Dussehra 2026 कब है दशहरा 20 या 21 अक्टूबर? जान लें पूजन के साथ रावण दहन का उत्तम मुहूर्त

प्रत्येक वर्ष आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा त्योहार बड़े ही उत्साह के साथ भारतवर्ष में मनाया जाता है। दशहरा को विजय का पर्व या विजयादशमी भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका दस राजा रावण का वध किया था। दशहरा अन्याय पर न्याय (बुराई पर अच्छाई) की जीत का प्रतीक है। इस दिन रामलीला का आयोजन किया जाता है और रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को जलाया जाता है। दशहरा के दिन पूजन के लिए प्रदोष काल सबसे शुभ समय माना जाता है। 

दशहरा क्यों मनाया जाता है:
मान्यता है कि त्रेतायुग में इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा ने 10 दिनों के कठिन और भयंकर युद्ध के बाद महिषासुर नामक असुर का संहार किया था, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है।

आइये जानते है इस बार दशहरा कब है और रावण दहन का शुभ मुहूर्त-

दशहरा किस दिन है
पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि शुरु 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 11 मिनट पर होगा। 
अतः दशहरा 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा।

दशहरा पूजा शुभ मुहूर्त 2026:
दशहरा के दिन शस्त्र और शमी पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है इस दिन शस्त्र पूजा करने से साधक के साहस में वृद्धि होती है। उसको कार्यों में सफलता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 
दशहरा पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 05 मिनट से दोपहर 02 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। 
अपराह्न पूजा का समय दोपहर 01:19 बजे से दोपहर 03:37 बजे तक रहेगा।

रावण दहन का शुभ मुहूर्त:
दशहरा पर रावण दहन प्रदोष काल में करना सबसे उत्तम माना जाता है। इस बार रावण दहन का 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को शाम 05:45 बजे के बाद रहेगा।

दशहरा के दिन क्या करना चाहिए:
दशहरा के दिन शाम के समय रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश दिया जाता है। इसके अलावा इस दिन शस्त्र और वाहन पूजन का विधान है। इस दिन लोग अपने-अपने काम से जुड़े औजारों, शस्त्रों, वाहनों और बही-खातों का पूजन करते हैं। दशहरा पर शमी पूजन का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि शमी पूजन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

शारदीय नवरात्रि 2026 Shardiya Navratri 2026

रविवार, 11 अक्तूबर से शुरू होंगे माँ दुर्गा के नौ दिन, जानें घटस्थापना से लेकर दशहरा तक की पूरी जानकारी

शारदीय नवरात्रि का पर्व इस बार 11 अक्तूबर में शुरू होने वाला है। माँ दुर्गा के भक्त पूरे नौ दिनों तक पुरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना, साधना करेंगे और व्रत रखेंगे। इसी दिन घरों और मंदिरों में घट/कलश स्थापना के साथ माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाएगी। नवरात्रि के अंतिम दिन सोमवार, 19 अक्तूबर को महानवमी होगी और अगले दिन यानी मंगलवार 20 अक्तूबर को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाएगा। 

वैदिक पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्तूबर की रात करीब 9:19 बजे शुरू होगी। यह तिथि 11 अक्तूबर की रात करीब 9:30 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 11 अक्तूबर को नवरात्रि का पहला दिन माना जाएगा।

धार्मिक महत्व
रविवार के दिन से नवरात्रि शुरू होने के कारण इस बार माँ दुर्गा का आगमन हाथी पर हो रहा है, जिसे शास्त्रों में बेहद शुभ व वर्षा और सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है।

घटस्थापना
घटस्थापना रविवार, 11 अक्तूबर को होगी। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। इसी के साथ माँ दुर्गा की पूजा शुरू होती है। कलश स्थापना के बाद पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त शहर और पंचांग के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उचित रहेगा। कलश स्थापना के समय मिट्टी/जमना रेट की वेदी पर जौ बोने की परंपरा है। इसके बाद कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखा जाता है। पूजा के स्थान पर अखंड ज्योत जलाने की भी परंपरा है।

घटस्थापना (कलश स्थापना) शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 6:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक (अवधि: 3 घंटे 52 मिनट)
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक

किस दिन किस देवी की पूजा होगी?
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस बार पूजा का क्रम इस प्रकार रहेगा।

11 अक्तूबर (रविवार) – माँ शैलपुत्री : नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी। इन्हें मां दुर्गा का पहला स्वरूप माना जाता है।
12 अक्तूबर (सोमवार) – माँ ब्रह्मचारिणी : दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाएगी। भक्त इस दिन व्रत रखकर मां की आराधना करते हैं।
13 अक्तूबर (मंगलवार) – माँ चंद्रघंटा : तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होगी। मां के इस स्वरूप को साहस और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है।
14 अक्तूबर (बुधवार) – माँ कूष्मांडा : चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होगी।
15 अक्तूबर (बृहस्पतिवार) – माँ स्कंदमाता : पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाएगी।
16 अक्तूबर (शुक्रवार) – माँ कात्यायनी : छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना होगी।
17 अक्तूबर (शनिवार) – माँ कालरात्रि : सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाएगी।
18 अक्तूबर (रविवार) – माँ महागौरी : आठवें दिन मां महागौरी की पूजा होगी। इस दिन कई जगह कन्या पूजन भी किया जाता है।
19 अक्तूबर (सोमवार) – माँ सिद्धिदात्री : नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी। इसी दिन महानवमी का पर्व मनाया जाएगा।

अष्टमी और नवमी कब है?
इस बार नवरात्रि की अष्टमी रविवार, 18 अक्तूबर को रहेगी। इस दिन माँ महागौरी की पूजा की जाएगी। कई घरों में अष्टमी के दिन कन्या पूजन और हवन किया जाता है। इसके अगले दिन सोमवार, 19 अक्तूबर को महानवमी होगी। नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्रि व्रत रखने वाले कई भक्त इसी दिन कन्या पूजन के बाद व्रत का पारण करते हैं। हालांकि व्रत पारण की परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।

20 अक्तूबर को दशहरा
नवरात्रि के बाद मंगलवार, 20 अक्तूबर 2026 को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। इसी दिन मां दुर्गा की पूजा के बाद कई स्थानों पर प्रतिमा विसर्जन किया जाता है। दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन करने की भी परंपरा है। हिंदू धर्म में विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। वहीं देवी परंपरा में महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय से भी इस पर्व को जोड़ा जाता है।

नवरात्रि में क्या करें?
नवरात्रि के दौरान भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां दुर्गा की पूजा करते हैं। सुबह स्नान के बाद पूजा स्थल की सफाई कर दीपक जलाया जाता है। मां को फल, फूल और प्रसाद अर्पित किया जाता है।व्रत रखने वाले लोग अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार करते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिन अनाज का सेवन नहीं करते, जबकि कई लोग पहले और आखिरी दिन व्रत रखते हैं।

नवरात्रि के दौरान श्री दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या माँदुर्गा के मंत्रों का पाठ करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि नवरात्रि में माँ की पूजा और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।

Pitra Paksha 2026 पितृ पक्ष (श्राद्ध पक्ष) : 26 या 27 सितंबर, कब से शुरू होगा, पूरी जानकारी

आचार्य अनिल जी अपने इस विशेष आलेख में बताते है पितृपक्ष वह समय होता है जब हम अपने पूर्वज जो पितर लोक में है उन्हें याद करते हैं। उनके नाम से निमित्त श्राद्ध कर्म Shradh Karam करते हैं। बता दें कि पितृपक्ष के 16 दिन पितृ पितर लोक से धरती पर अपने परिवारजनों को देखने के लिए आते हैं। इस दौरान नियमित रुप से जप तप और पितरों के नाम से तर्पण आदि कार्य करने से पितर प्रसन्न होते हैं।

आइए जानते हैं इस साल पितृपक्ष कब से आरंभ हो रहा है। देखें पितृपक्ष की सारी प्रमुख तिथियां।

2026 में कब से आरंभ हो रहा है पितृपक्ष (Pitru Paksha 2026 Start Date)
पंचांग की गणना के अनुसार, पितृपक्ष का आरंभ 26 सितम्बर से होगा। इस दिन पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध होगा। इस बार पितृपक्ष में गच्छाया योग भी बन रहा है। इस बार 10 अक्टूबर को सूर्य और चंद्रमा दोनों हस्त नक्षत्र में गोचर करेंगे जिससे गजच्छाया योग Gajachaya Yoga का निर्माण होगा। बता दें कि इस बार चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध एक ही दिन पर होने वाला है। बता दें कि आश्विन अमावस (पितृ अमावस) के दिन सूर्य और चन्द्रमा (दोनों) हस्त नक्षत्र में संचार कर रहे तो ‘गजच्छाया योग’ बना है। इस योग में श्राद्ध, पितृ-तर्पण तथा तीर्थस्नान का अत्यधिक माहात्म्य होता है। इसदिन (10 अक्तूबर, शनिवार) यह योग सारा दिन (सूर्योदय से सूर्यास्त तक) होगा।

श्राद्ध उस तिथि पर किया जाता है जिस दिन व्यक्ति की मृत्यु हुई थी, न कि कैलेंडर की वर्षगाँठ पर।

पितृ पक्ष 2026 मुख्य तिथियां (Shradh Dates 2026)
26 सितंबर 2026 (शनिवार): पूर्णिमा श्राद्ध
27 सितंबर 2026 (रविवार): प्रतिपदा श्राद्ध (मुख्य पक्ष आरंभ)
28 सितंबर 2026: द्वितीया श्राद्ध
29 सितंबर 2026: तृतीया श्राद्ध
30 सितंबर 2026: चतुर्थी और पंचमी तिथि का श्राद्ध (एक ही दिन)
1 अक्टूबर 2026: षष्ठी श्राद्ध
2 अक्टूबर 2026: सप्तमी श्राद्ध
3 अक्टूबर 2026: अष्टमी श्राद्ध
4 अक्टूबर 2026: नवमी श्राद्ध (जिसे परिवार की विवाहित स्त्रियों हेतु मातृ नवमी के रूप में भी मनाया जाता है।)
5 अक्टूबर 2026: दशमी श्राद्ध
6 अक्टूबर 2026: एकादशी श्राद्ध
7 अक्टूबर 2026: द्वादशी श्राद्ध
8 अक्टूबर 2026: त्रयोदशी श्राद्ध
9 अक्टूबर 2026: चतुर्दशी श्राद्ध
10 अक्टूबर 2026 (शनिवार): सर्वपितृ अमावस्या (समापन)

क्या आप पितृ पक्ष में किए जाने वाले तर्पण और पिंडदान की विधि के बारे में विस्तार से जानना चाहते हैं? हमारे पंडित जी या ज्योतिषाचार्य से बात करें। Contact Us

पितृ पक्ष से जुड़े कुछ बेहद महत्वपूर्ण और ज्ञानवर्धक आलेख (लेख) यहाँ दिए गए हैं, जो इसके धार्मिक महत्व, नियमों, और तिथियों को सरल भाषा में समझाते हैं:

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