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Kartik month 2026 कार्तिक मास – अध्यात्म की दृष्टि से

Indira Ekadashi-2026-Pitru Paksha-Shradh Paksha

एकादशी व्रत से पहले जान लें सही तिथि, पूजन और श्राद्ध के उत्तम मुहूर्त

हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को बेहद ही महत्वपूर्ण माना जाता है। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के पूजन का विधान है। पंचांग के अनुसार, हर महीने दो एकादशी तिथि आती हैं (एक कृष्ण पक्ष और दूसरी शुक्ल पक्ष)। इस समय पितृ पक्ष चल रहा है जिसकी अवधि 16 दिनों की होती है। इस अवधि में एकादशी व्रत भी रखा जाता है। पितृ पक्ष का एकादशी व्रत आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि में आता है। इस एकादशी का नाम है-इंदिरा एकादशी। मान्यता है कि इंदिरा एकादशी व्रत करने से व्रतधारी के पितरों को मोक्ष प्राप्त होता है और भगवान विष्णु की कृपा से पापों से मुक्ति मिलना सम्भव है। पितृ पक्ष की एकादशी तिथि को व्रत रखने के साथ ही पितरों के तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान का भी विधान है।

आइये जानते है इस वर्ष पितृपक्ष में एकादशी व्रत कब रखा जाएगा और तर्पण और श्राद्ध के शुभ मुहूर्त क्या है?

पितृपक्ष में इंदिरा एकादशी व्रत कब है:
पंचांग के अनुसार आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी की शुरुआत 5 अक्टूबर, सोमवार को मध्यरात्रि के बाद 2 बजकर 8 मिनट पर होगी, यानी 6 अक्टूबर, मंगलवार को सूर्योदय से पहले ही एकादशी तिथि लग जाएगी। वहीं, रात में 12 बजकर 35 मिनट तक एकादशी तिथि व्याप्त रहेगी। 6 अक्टूबर को सूर्योदय से पूर्व ही एकादशी लग जा रही है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 6 अक्टूबर को इंदिरा एकादशी का व्रत करना शास्त्र सम्मत होगा।

इंदिरा एकादशी पूजन और दान के शुभ मुहूर्त:
एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा की जाती है। इस दिन गरीब और जरूरतमंद की सेवा या दान करना भी अति उत्तम माना जाता है।

इंदिरा एकादशी सुबह-शाम पूजा का शुभ मुहूर्त

सुबह का लाभ चौघड़िया : सुबह 10 बजकर 40 मिनट से लेकर 12 बजकर 9 मिनट तक
शुभ चौघड़िया : दोपहर के 3 बजकर 5 मिनट से लेकर 4 बजकर 33 मिनट तक
शाम का लाभ चौघड़िया : शाम को 7 बजकर 33 मिनट से लेकर 9 बजकर 5 मिनट तक

इंदिरा एकादशी पूजा विधि
मान्यता है कि दशमी तिथि के दिन व्रती को भूमि पर शयन करना चाहिए। फिर, अगले दिन इंदिरा एकादशी तिथि को सुबह सूर्योदय से पूर्व उठ जाएं।
दशमी तिथि को ब्राह्मण, गाय, कुत्ते और कौवे के लिए भोजन का प्रबंध करें। साथ ही, इस दिन सात्विक भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
स्नानादि करके साफ वस्त्र धारण करें और सबसे पहले मन में श्रीहरि का स्मरण करके व्रत का संकल्प लें। इसके बाद, पूजा घर साफ करें।
मंदिर में एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीले रंग का वस्त्र बिछाएं और उस पर भगवान विष्णु और लक्ष्मीजी की प्रतिमा रखें।
श्रीहरि और देवी लक्ष्मी को नए वस्त्र अर्पित करें। साथ ही, ताजे पुष्प, माला, धूप-दीप आदि भी अर्पित करें और घी का दीपक जलाएं।
भगवान को भोग लगाने के बाद इंदिरा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और फिर, विधि-पूर्वक पूजन आरती करें।

इंदिरा एकादशी व्रत का महत्व:
विष्णु पुराण के अनुसार, इंदिरा एकादशी व्रत करने से मनुष्य को जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्ति मिलती है। जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। पूर्वजों को मोक्ष मिलता है और इस व्रत के पुण्य प्रभाव से यमलोक में कष्ट भोग रहे पितरों को वैकुंठ की प्राप्ति होती है।

एकादशी तिथि पर किन पितरों का किया जाता है श्राद्ध:
इस दिन उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनकी मृत्यु किसी भी महीने के कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को हुई हो। इसके अलावा इस तिथि पर संन्यासी या वैरागी जीवन जीने वाले पितरों का भी श्राद्ध करने की परंपरा है।

एकादशी पर श्राद्ध के मुहूर्त 2026:
कुतुप मुहूर्त: प्रातः 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक
रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से दोपहर 01:20 बजे तक
अपराह्न काल: दोपहर 01:20 बजे से दोपहर 03:40 बजे तक

इंदिरा एकादशी व्रत कथा

कथा के अनुसार धर्मराज युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से कहने लगे कि हे भगवान! आश्विन कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि तथा फल क्या है? सो कृपा करके कहिए। 
भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम इंदिरा एकादशी है। यह एकादशी पापों को नष्ट करने वाली तथा पितरों को अ‍धोगति से मुक्ति देने वाली होती है। हे राजन! ध्यानपूर्वक इसकी कथा सुनो। इसके सुनने मात्र से ही वायपेय यज्ञ का फल मिलता है।

प्राचीनकाल में सतयुग के समय में महिष्मति नाम की एक नगरी में इंद्रसेन नाम का एक प्रतापी राजा धर्मपूर्वक अपनी प्रजा का पालन करते हुए शासन करता था। वह राजा पुत्र, पौत्र और धन आदि से संपन्न और विष्णु का परम भक्त था। एक दिन जब राजा सुखपूर्वक अपनी सभा में बैठा था तो आकाश मार्ग से महर्षि नारद उतरकर उसकी सभा में आए। राजा उन्हें देखते ही हाथ जोड़कर खड़ा हो गया और विधिपूर्वक आसन व अर्घ्य दिया।

सुख से बैठकर मुनि ने राजा से पूछा कि हे राजन! आपके सातों अंग कुशलपूर्वक तो हैं? तुम्हारी बुद्धि धर्म में और तुम्हारा मन विष्णु भक्ति में तो रहता है? देवर्षि नारद की ऐसी बातें सुनकर राजा ने कहा- हे महर्षि! आपकी कृपा से मेरे राज्य में सब कुशल है तथा मेरे यहाँ यज्ञ कर्मादि सुकृत हो रहे हैं। आप कृपा करके अपने आगमन का कारण कहिए। तब ऋषि कहने लगे कि हे राजन! आप आश्चर्य देने वाले मेरे वचनों को सुनो।

मैं एक समय ब्रह्मलोक से यमलोक को गया, वहाँ श्रद्धापूर्वक यमराज से पूजित होकर मैंने धर्मशील और सत्यवान धर्मराज की प्रशंसा की। उसी यमराज की सभा में महान ज्ञानी और धर्मात्मा तुम्हारे पिता को एकादशी का व्रत भंग होने के कारण देखा। उन्होंने संदेशा दिया सो मैं तुम्हें कहता हूँ। उन्होंने कहा कि पूर्व जन्म में ‍कोई विघ्न हो जाने के कारण मैं यमराज के निकट रह रहा हूँ, सो हे पुत्र यदि तुम आश्विन कृष्णा इंदिरा एकादशी का व्रत मेरे निमित्त करो तो मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।

इतना सुनकर राजा कहने लगा कि हे महर्षि आप इस व्रत की विधि मुझसे कहिए। नारदजी कहने लगे- आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की दशमी के दिन प्रात:काल श्रद्धापूर्वक स्नानादि से निवृत्त होकर पुन: दोपहर को नदी आदि में जाकर स्नान करें। फिर श्रद्धापूर्व पितरों का श्राद्ध करें और एक बार भोजन करें। प्रात:काल होने पर एकादशी के दिन दातून आदि करके स्नान करें, फिर व्रत के नियमों को भक्तिपूर्वक ग्रहण करता हुआ प्रतिज्ञा करें कि ‘मैं आज संपूर्ण भोगों को त्याग कर निराहार एकादशी का व्रत करूँगा।

हे अच्युत! हे पुंडरीकाक्ष! मैं आपकी शरण हूँ, आप मेरी रक्षा कीजिए, इस प्रकार नियमपूर्वक शालिग्राम की मूर्ति के आगे विधिपूर्वक श्राद्ध करके योग्य ब्राह्मणों को फलाहार का भोजन कराएँ और दक्षिणा दें। पितरों के श्राद्ध से जो बच जाए उसको सूँघकर गौ को दें तथा ध़ूप, दीप, गंध, ‍पुष्प, नैवेद्य आदि सब सामग्री से ऋषिकेश भगवान का पूजन करें।

रात में भगवान के निकट जागरण करें। इसके पश्चात द्वादशी के दिन प्रात:काल होने पर भगवान का पूजन करके ब्राह्मणों को भोजन कराएँ। भाई-बंधुओं, स्त्री और पुत्र सहित आप भी मौन होकर भोजन करें। नारदजी कहने लगे कि हे राजन! इस विधि से यदि तुम आलस्य रहित होकर इस एकादशी का व्रत करोगे तो तुम्हारे पिता अवश्य ही स्वर्गलोक को जाएँगे। इतना कहकर नारदजी अंतर्ध्यान हो गए।

नारदजी के कथनानुसार राजा द्वारा अपने बाँधवों तथा दासों सहित व्रत करने से आकाश से पुष्पवर्षा हुई और उस राजा का पिता गरुड़ पर चढ़कर विष्णुलोक को गया। राजा इंद्रसेन भी एकादशी के व्रत के प्रभाव से निष्कंटक राज्य करके अंत में अपने पुत्र को सिंहासन पर बैठाकर स्वर्गलोक को गया।

हे युधिष्ठिर! यह इंदिरा एकादशी के व्रत का माहात्म्य मैंने तुमसे कहा। इसके पढ़ने और सुनने से मनुष्य सब पापों से छूट जाते हैं और सब प्रकार के भोगों को भोगकर बैकुंठ को प्राप्त होते हैं।

When is Dussehra 2026 कब है दशहरा 20 या 21 अक्टूबर? जान लें पूजन के साथ रावण दहन का उत्तम मुहूर्त

प्रत्येक वर्ष आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को दशहरा त्योहार बड़े ही उत्साह के साथ भारतवर्ष में मनाया जाता है। दशहरा को विजय का पर्व या विजयादशमी भी कहा जाता है। मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंका दस राजा रावण का वध किया था। दशहरा अन्याय पर न्याय (बुराई पर अच्छाई) की जीत का प्रतीक है। इस दिन रामलीला का आयोजन किया जाता है और रावण के साथ मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों को जलाया जाता है। दशहरा के दिन पूजन के लिए प्रदोष काल सबसे शुभ समय माना जाता है। 

दशहरा क्यों मनाया जाता है:
मान्यता है कि त्रेतायुग में इसी दिन मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर माता सीता को उसके बंधन से मुक्त कराया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां दुर्गा ने 10 दिनों के कठिन और भयंकर युद्ध के बाद महिषासुर नामक असुर का संहार किया था, इसलिए इसे विजयादशमी भी कहा जाता है।

आइये जानते है इस बार दशहरा कब है और रावण दहन का शुभ मुहूर्त-

दशहरा किस दिन है
पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि शुरु 20 अक्टूबर 2026 को दोपहर 12 बजकर 50 मिनट पर होगी और इसका समापन 21 अक्टूबर को दोपहर 02 बजकर 11 मिनट पर होगा। 
अतः दशहरा 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा।

दशहरा पूजा शुभ मुहूर्त 2026:
दशहरा के दिन शस्त्र और शमी पूजा करने की परंपरा है। मान्यता है इस दिन शस्त्र पूजा करने से साधक के साहस में वृद्धि होती है। उसको कार्यों में सफलता और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। 
दशहरा पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 02 बजकर 05 मिनट से दोपहर 02 बजकर 51 मिनट तक रहेगा। 
अपराह्न पूजा का समय दोपहर 01:19 बजे से दोपहर 03:37 बजे तक रहेगा।

रावण दहन का शुभ मुहूर्त:
दशहरा पर रावण दहन प्रदोष काल में करना सबसे उत्तम माना जाता है। इस बार रावण दहन का 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को शाम 05:45 बजे के बाद रहेगा।

दशहरा के दिन क्या करना चाहिए:
दशहरा के दिन शाम के समय रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन कर अधर्म पर धर्म की जीत का संदेश दिया जाता है। इसके अलावा इस दिन शस्त्र और वाहन पूजन का विधान है। इस दिन लोग अपने-अपने काम से जुड़े औजारों, शस्त्रों, वाहनों और बही-खातों का पूजन करते हैं। दशहरा पर शमी पूजन का भी विशेष महत्व है। मान्यता है कि शमी पूजन करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है।

शारदीय नवरात्रि 2026 Shardiya Navratri 2026

रविवार, 11 अक्तूबर से शुरू होंगे माँ दुर्गा के नौ दिन, जानें घटस्थापना से लेकर दशहरा तक की पूरी जानकारी

शारदीय नवरात्रि का पर्व इस बार 11 अक्तूबर में शुरू होने वाला है। माँ दुर्गा के भक्त पूरे नौ दिनों तक पुरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना, साधना करेंगे और व्रत रखेंगे। इसी दिन घरों और मंदिरों में घट/कलश स्थापना के साथ माँ दुर्गा की पूजा शुरू की जाएगी। नवरात्रि के अंतिम दिन सोमवार, 19 अक्तूबर को महानवमी होगी और अगले दिन यानी मंगलवार 20 अक्तूबर को विजयादशमी (दशहरा) मनाया जाएगा। 

वैदिक पंचांग के अनुसार आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि 10 अक्तूबर की रात करीब 9:19 बजे शुरू होगी। यह तिथि 11 अक्तूबर की रात करीब 9:30 बजे तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर 11 अक्तूबर को नवरात्रि का पहला दिन माना जाएगा।

धार्मिक महत्व
रविवार के दिन से नवरात्रि शुरू होने के कारण इस बार माँ दुर्गा का आगमन हाथी पर हो रहा है, जिसे शास्त्रों में बेहद शुभ व वर्षा और सुख-समृद्धि लाने वाला माना गया है।

घटस्थापना
घटस्थापना रविवार, 11 अक्तूबर को होगी। नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना का विशेष महत्व होता है। इसी के साथ माँ दुर्गा की पूजा शुरू होती है। कलश स्थापना के बाद पहले दिन माँ शैलपुत्री की पूजा की जाती है। घटस्थापना के लिए शुभ मुहूर्त शहर और पंचांग के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है। इसलिए अपने स्थानीय पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखना उचित रहेगा। कलश स्थापना के समय मिट्टी/जमना रेट की वेदी पर जौ बोने की परंपरा है। इसके बाद कलश में जल भरकर उसके ऊपर आम या अशोक के पत्ते और नारियल रखा जाता है। पूजा के स्थान पर अखंड ज्योत जलाने की भी परंपरा है।

घटस्थापना (कलश स्थापना) शुभ मुहूर्त
प्रातःकाल मुहूर्त: सुबह 6:19 बजे से सुबह 10:12 बजे तक (अवधि: 3 घंटे 52 मिनट)
अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:44 बजे से दोपहर 12:31 बजे तक

किस दिन किस देवी की पूजा होगी?
नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा की जाती है। इस बार पूजा का क्रम इस प्रकार रहेगा।

11 अक्तूबर (रविवार) – माँ शैलपुत्री : नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा होगी। इन्हें मां दुर्गा का पहला स्वरूप माना जाता है।
12 अक्तूबर (सोमवार) – माँ ब्रह्मचारिणी : दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाएगी। भक्त इस दिन व्रत रखकर मां की आराधना करते हैं।
13 अक्तूबर (मंगलवार) – माँ चंद्रघंटा : तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा होगी। मां के इस स्वरूप को साहस और शक्ति से जोड़कर देखा जाता है।
14 अक्तूबर (बुधवार) – माँ कूष्मांडा : चौथे दिन मां कूष्मांडा की पूजा होगी।
15 अक्तूबर (बृहस्पतिवार) – माँ स्कंदमाता : पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाएगी।
16 अक्तूबर (शुक्रवार) – माँ कात्यायनी : छठे दिन मां कात्यायनी की आराधना होगी।
17 अक्तूबर (शनिवार) – माँ कालरात्रि : सातवें दिन मां कालरात्रि की पूजा की जाएगी।
18 अक्तूबर (रविवार) – माँ महागौरी : आठवें दिन मां महागौरी की पूजा होगी। इस दिन कई जगह कन्या पूजन भी किया जाता है।
19 अक्तूबर (सोमवार) – माँ सिद्धिदात्री : नवरात्रि के नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा होगी। इसी दिन महानवमी का पर्व मनाया जाएगा।

अष्टमी और नवमी कब है?
इस बार नवरात्रि की अष्टमी रविवार, 18 अक्तूबर को रहेगी। इस दिन माँ महागौरी की पूजा की जाएगी। कई घरों में अष्टमी के दिन कन्या पूजन और हवन किया जाता है। इसके अगले दिन सोमवार, 19 अक्तूबर को महानवमी होगी। नवमी के दिन माँ सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। नवरात्रि व्रत रखने वाले कई भक्त इसी दिन कन्या पूजन के बाद व्रत का पारण करते हैं। हालांकि व्रत पारण की परंपरा परिवार और क्षेत्र के अनुसार अलग हो सकती है।

20 अक्तूबर को दशहरा
नवरात्रि के बाद मंगलवार, 20 अक्तूबर 2026 को विजयादशमी यानी दशहरा मनाया जाएगा। इसी दिन मां दुर्गा की पूजा के बाद कई स्थानों पर प्रतिमा विसर्जन किया जाता है। दशहरे पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन करने की भी परंपरा है। हिंदू धर्म में विजयादशमी को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। मान्यता के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। वहीं देवी परंपरा में महिषासुर पर मां दुर्गा की विजय से भी इस पर्व को जोड़ा जाता है।

नवरात्रि में क्या करें?
नवरात्रि के दौरान भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार मां दुर्गा की पूजा करते हैं। सुबह स्नान के बाद पूजा स्थल की सफाई कर दीपक जलाया जाता है। मां को फल, फूल और प्रसाद अर्पित किया जाता है।व्रत रखने वाले लोग अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार करते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिन अनाज का सेवन नहीं करते, जबकि कई लोग पहले और आखिरी दिन व्रत रखते हैं।

नवरात्रि के दौरान श्री दुर्गा सप्तशती, दुर्गा चालीसा या माँदुर्गा के मंत्रों का पाठ करने की भी परंपरा है। मान्यता है कि नवरात्रि में माँ की पूजा और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होता है।

Ananta Chaturdashi 2026 : जाने सही तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त और अनंत सूत्र बांधने का महत्व

सनातन धर्म में अनंत चतुर्दशी को विशेष रूप से लाभकारी माना जाता है। यह सनातन की प्रमुख तिथियों में से एक है। यह दिन मुख्य रूप से भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा के लिए विशेष माना जाता है। इस दिन भक्त जन पूरी श्रद्धा भाव से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और उनसे घर की समृद्धि का आशीर्वाद लेते हैं।अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा और अनंत सूत्र बांधें। पूजा के लिए शुभ मुहूर्त और राहु काल से बचें।

इस दिन सबसे खास माना जाता है अनंत सूत्र बांधना। यह एक ऐसा धागा होता है जिसमें 14 गांठें लगाईं जाती हैं और पूजन के बाद इसे हाथ में बांधा जाता है। इसी दिन गणपति विसर्जन भी होता है। इस वजह से लोग विष्णु जी के साथ गणपति की पूजा भी करते हैं। इस साल अनंत चतुर्दशी की तिथि को लेकर लोगों के मन में शंका है और यह पर्व किस दिन मनाया जाएगा, इसके बारे में सभी जानकारी लेना चाहते हैं। आवे आपको बताते हैं इसकी सही तारीख, पूजा का शुभ मुहूर्त और महत्व क्या है?

अनंत चतुर्दशी का महत्व

वैसे तो विष्णु जी एक कई रूप और अवतार हैं, लेकिन अनंत चतुर्दशी के दिन उनके अनंत रूप का पूजन किया जाता है। अनंत भगवान विष्णु का एक नाम और स्वरूप है। भगवान विष्णु अनंत रूप में शेषनाग पर विराजमान हैं। वो शेषनाग की शैय्या पर ही शयन करते हैं, इसलिए भगवान विष्णु का को अनंत नाम से भी पुकारा जाता है। भगवान श्री हरि विष्णु का नारद पुराण में सबसे अच्छा उल्लेख मिलता है और बताया गया है कि भादो महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को अनंत चतुर्दशी के नाम से जाना जाता है। यही नहीं इस दिन अनंत सूत्र बांधने की परंपरा भी सदियों से चली आ रही है। मान्यता है कि अनंत धागा हाथ में बांधने से आपके जीवन में समृध्दि बनी रहती है।

अनंत सूत्र बांधने का महत्व
अनंत चतुर्दशी के दिन अनंत सूत्र में 14 गांठे लगाकर बांधा जाता है। इसे 14 लोक माना जाता है। 14 लोकों में भगवान विष्णु ही विराजमान हैं। इसलिए 14 गांठों वाला अनंत धागा बांधना विष्णु जी की भक्ति का प्रतीक होता है। इस धागे को पहले हल्दी से रंगा जाता है, जो शुभता का प्रतीक है। जो व्यक्ति इसे हाथ में बांधता है उसके ऊपर विष्णु जी की कृपा बनी रहती है। धागे को पूजन के बाद 14 गांठ लगाकर भगवान विष्णु को समर्पित किया जाता है, उसके बाद ही इसे हाथ में पहना जाता है। महिलाएं इसे बाईं भुजा में पहनती हैं और पुरुष इसे दाहिने हाथ में धरा करते हैं। अनंत चतुर्दशी के दिन विष्णु जी के अनंत स्वरूप की पूजा करनी चाहिए जिससे जीवन में समृद्धि बनी रहती है।

अनंत चतुर्दशी 2026 कब है?

इस साल अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर, शुक्रवार को मनाई जाएगी।
अनंत चतुर्दशी तिथि आरंभ- 24 सितंबर 2026 रात्रि 11:18 बजे
चतुर्दशी तिथि समाप्त- 25 सितंबर, रात 11:06 बजे
ऐसे में उदया तिथि के अनुसार यह व्रत 25 सितंबर को ही रखना फलदायी होगा।

अनंत चतुर्दशी पूजा का शुभ मुहूर्त

अनंत चतुर्दशी के दिन पूजा के कुछ विशेष शुभ मुहूर्त मिल रहे हैं। अगर आप इन्हीं मुहूर्त में पूजा करेंगे, तो आपको शुभ फल मिलेंगे।

सूर्योदय और सूर्यास्त का समय- 25 सितंबर प्रातः 06:10 और शाम 06:14

ब्रह्म मुहूर्त प्रात-04:35 से प्रातः 05:23 तक

अभिजीत मुहूर्त- प्रातः 11:50 से दोपहर 12:38 तक

राहु काल-प्रातः 10:43 से दोपहर 12:14 तक (आपको राहु काल में कोई भी पूजन नहीं करना चाहिए, इसलिए इस समय न करें तो बेहतर होगा)

Parivartini Ekadashi 2026

आचार्य अनिल जी अपने इस विशेष आलेख में बताते है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जा रहा है। इस एकादशी को भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है: जैसे पार्श्व एकादशी (Parsva Ekadashi), वामन एकादशी (Vamana Ekadashi),पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi) आदि। 

  • पार्श्व एकादशी (Parsva Ekadashi): ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास में भगवान विष्णु शयन करते है। चातुर्मास में योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट (पार्श्व) बदलते हैं, इसलिए इसे पार्श्व एकादशी या परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं।
  • वामन एकादशी (Vamana Ekadashi): इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के ‘वामन अवतार’ की पूजा की जाती है।
  • पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi): धार्मिक ग्रंथों में इसे पद्मा एकादशी नाम से भी संबोधित किया गया है।
  • जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi): पापों का नाश कर विजय और मुक्ति दिलाने के कारण इसे जयंती एकादशी भी कहते हैं।
  • जलझूलनी एकादशी / डोल ग्यारस (Jaljhulani Ekadashi/Dol Gyaras): राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे क्षेत्रों में इस दिन ठाकुर जी (भगवान विष्णु/कृष्ण) को पालकी में बैठाकर जलाशय पर स्नान कराने ले जाया जाता है, इसलिए इसे स्थानीय रूप से यह नाम दिया गया है

परिवर्तिनी/पद्मा एकादशी का महत्व
इस परिवर्तिनी एकादशी को पद्मा एकादशी या वामन एकादशी भी कहते हैं।
मान्यता है कि चातुर्मास में योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट बदलते हैं।
इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है।
अगर आप पूजा की विधि या कथा के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया हमें बताएं।

नोट : वर्ष 2026 में परिवर्तिनी एकादशी (पार्श्व एकादशी) का मुख्य व्रत 22 सितंबर 2026, मंगलवार को रखा जाएगा।

तिथि और मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 सितंबर 2026 की रात 08:00 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 22 सितंबर 2026 की रात 09:43 बजे तक
व्रत पारण का समय (23 सितंबर 2026, बुधवार): सुबह 06:10 बजे से सुबह 08:35 बजे के बीच

परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा

परिवर्तिनी एकादशी की पौराणिक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की कथा से जुड़ी है, जिसे www.bhagyaniti.com पर विस्तार से पढ़ा जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेता युग में राजा बलि नाम का एक दैत्य था। बलि का जन्म असुर कुल में हुआ था, लेकिन वह अत्यंत दानशील, सत्यवादी और भगवान विष्णु का परम भक्त था। अपनी भक्ति और पुण्य कर्मों के प्रभाव से उसने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया और देवराज इंद्र को भी युद्ध में पराजित कर दिया।

राजा बलि से हार जाने के बाद इंद्र और अन्य सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और अपनी रक्षा की गुहार लगाई। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) रूप धारण किया। भगवान वामन ने राजा बलि के पास जाकर भिक्षा में केवल तीन कदम (पग) भूमि दान में मांगी। राजा बलि का स्वभाव दानी था, तो उसने बिना सोचे-समझे यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने अत्यंत विशाल रूप धारण कर लिया और पहले पग में भगवान ने पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में आकाश और स्वर्गलोक को ढंक लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तब वचनों से बंधे दानी राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा पग उनके मस्तक पर रखें। 
राजा बलि की इस वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उसे पाताल लोक (अधोलोक) का स्वामी बना दिया और उसे वरदान दिया कि वे क्षीरसागर में शेषनाग पर सोते हुए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन करवट बदलेंगे। यही कारण है कि इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी (या पार्श्व/पद्मा एकादशी) कहा जाता है।

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Radha Ashtami 2026

18 या 19 सितंबर, कब है राधा अष्टमी? जानें तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि

राधा अष्टमी भाद्रपद शुक्ल अष्टमी तिथि को मनाई जाती है। मान्यता है कि इसी दिन राधा रानी का प्राकट्य हुआ था। राधा अष्टमी पर भक्त व्रत और राधा जी संग श्रीकृष्ण की पूजा करते हैं। कहते हैं कि राधा रानी की पूजा और नाम जप करने से श्रीकृष्णजी भी प्रसन्न होते हैं। ऐसे में भक्तों को राधा रानी और भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त हो सकती है। इस दिन राधा रानी की विधि-विधान से पूजा की जाती है। ऐसे में भक्त विधिपूर्वक व्रत और पूजा करते हैं।

राधा अष्टमी कब मनाई जाएगी? साथ ही, शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

राधा अष्टमी कब है ?
पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि (शनिवार, 19 सितंबर) को राधा अष्टमी मनाई मनाई जाती है।
अष्टमी तिथि का आरंभ 18 सितंबर, शुक्रवार को दोपहर 1 बजकर 2 मिनट पर होगा। वहीं, अगले दिन यानी 19 सितंबर, शनिवार के दिन दोपहर के 3 बजकर 28 मिनट तक अष्टमी तिथि व्याप्त रहेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 19 सितंबर को राधा अष्टमी मनाई जाएगी और इसी दिन व्रत करना भी शास्त्र सम्मत होगा।

शुभ चौघड़िया : सुबह 7 बजकर 39 मिनट से 9 बजकर 11 मिनट तक
लाभ चौघड़िया : दोपहर में 1 बजकर 46 मिनट से 3 बजकर 18 मिनट तक
अमृत चौघड़िया : दोपहर में 3 बजकर 18 मिनट से 4 बजकर 50 मिनट तक
लाभ चौघड़िया : शाम को 6 बजकर 22 मिनट से 7 बजकर 50 मिनट तक

राधा अष्टमी पूजा विधि
व्रती को राधा अष्टमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नानादि के बाद साफ वस्त्र धारण करने चाहिए। फिर, ध्यान करें और सूर्य देव को जल अर्पित करें।
नित्य कर्म करने के बाद सबसे पहले राधा अष्टमी व्रत का संकल्प लेना चाहिए। फिर, राधा रानी की पूजा करें।
पूजा के लिए अपने घर के मंदिर में एक चौकी पर लाल या पीले रंग का साफ वस्त्र बिछाएं। उस पर राधा राना और भगवान कृष्ण की प्रतिमा स्थापित करें।
चारों ओर गंगाजल का छिड़काव करें। चंदन, अक्षत, फूल, सिंदूर, सुगंध, रोली, फल, धूप-दीप आदि अर्पित करके राधा रानी संग श्रीकृष्ण की विधि विधान से पूजा आरती करें।
साथ ही, खीर और मिठाई का भोग लगाएं। राधा रानी के मंत्र ‘ओम ह्नीं श्रीं राधिकायै नम:’ का जप करें। ऐसा करना बेहद शुभ फलदायी माना जाता है।
राधा रानी की पूजा दोपहर के समय करने का विधान होता है। व्रत में एक समय भोजन करें और अगले दिन ब्रह्माणों को भोजन कराकर दक्षिणा दें। साथ ही, सुहागिन महिलाओं को श्रृंगार का सामान भेंट करें। इस प्रकार राधा अष्टमी का व्रत पूर्ण करना चाहिए।

Putrada Ekadashi Vrat Katha 24 Aug 2026

सावन पुत्रदा एकादशी : (सोमवार, 24 अगस्त 2026)

सावन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को “पुत्रदा एकादशी” के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी के अन्य नाम है- पवित्र एकादशी और पवित्रोपना एकादशी। मान्यता के अनुसार इस व्रत को करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। साथ ही इस व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में हुए पापों से भी मुक्ति मिलती है। व्रत का पूरा लाभ पाने के लिए पुत्रदा एकादशी व्रत कथा का पूरा पाठ करें।

पुत्रदा एकादशी व्रत की संपूर्ण कथा

युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण जी से पूछा- हे भगवन! सावन के शुक्ल पक्ष में किस नाम की एकादशी होती है? कृपया मेरे सामने उसका वर्णन कीजिए।

युधिष्ठिर की बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण बोले- हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल की बात है, द्वापर युग के एकदम आरंभ का समय था। माहिष्मती पुर में राजा महीजित अपने राज्य का पालन करते थे। राजा के यहाँ कोई पुत्र नहीं था जिस कारण राजा हमेशा दुखी रहते थे। संतान के अभाव में राजा को राज्य सुखदायक नहीं प्रतीत होता था। अपनी बढ़ती उम्र देख राजा को बड़ी चिंता हुई। 

एक बार राजा ने प्रजा वर्ग में बैठकर इस प्रकार कहा- ‘प्रजाजनो! इस जन्म में मुझसे कोई पातक नहीं हुआ। मैंने अपने खजाने में अन्याय से कमाया हुआ धन नहीं जमा किया है। ब्राह्मणों और देवताओं का धन भी मैंने कभी नहीं लिया है। प्रजा का सन्तानवत (पुत्रवत) पालन किया, धर्म पूर्वक ही पृथ्वी पर अधिकार जमाया। दुष्टों को, वे बन्धु और पुत्रों के समान ही क्यों न रहे हों, दण्ड दिया है। सदाचारी पुरुषों का सदा सम्मान किया और किसी को द्वेष का पात्र नहीं समझा। फिर क्या कारण है, जो मेरे आज तक पुत्र उत्पन्न नहीं हुआ। आप लोग इसका विचार करके समाधान निकाले। 

राजा के ऐसे वचन सुनकर राजा का कल्याण चाहने वाले वे सभी लोग (प्रजा और पुरोहितों के साथ ब्राह्मणों ने) उनके हित का विचार करके साधु संत, महात्माओं से समाधान जानना चाहा। वे गहन वन में गए लेकिन वहाँ भी कोई ऐसा सिद्ध पुरुष नहीं मिला जो समाधान दे सके। एक दिन उनकी भेंट मुनिश्रेष्ठ लोमश से हुई। लोमश ऋषि धर्म के तत्त्वज्ञ, संपूर्ण शास्त्रों के विशिष्ट विद्वान, दीर्घायु और महात्मा हैं। उनका शरीर लोम से भरा हुआ है। ये ब्रह्माजी के समान तेजस्वी हैं। (एक-एक कल्प बीतने पर उनके शरीर का एक-एक लोम विशीर्ण होता- टूटकर गिरता है, इसलिये उनका नाम लोमश हुआ है।) वे महामुनि तीनों कालों की बातें जानते हैं। उन्हें देखकर सब लोगों को बड़ा हर्ष हुआ। उन्हें निकट आया देख लोमश जी ने पूछा- ‘तुम सब लोग किसलिए यहां आए हो ? अपने आगमन का कारण बताओ। तुम लोगों के लिए जो हितकर कार्य होगा, उसे मैं अवश्य करूंगा।

प्रजाजनों ने कहा- ब्राह्मण। इस समय महीजित नाम वाले जो राजा हैं, उन्हें कोई पुत्र नहीं है। हम लोग उन्हीं की प्रजा हैं, जिनका उन्होंने पुत्र की भांति पालन किया है। उन्हें पुत्रहीन देख, उनके दुःख से दुःखित हो हम तपस्या करने का दृढ़ निश्चय करके यहां आये हैं। राजा के भाग्य से इस समय हमें आपका दर्शन मिल गया है। महापुरुषों के दर्शन से ही मनुष्यों के सब कार्य सिद्ध हो जाते हैं। मुने! अब हमें उस उपाय का उपदेश कीजिए, जिससे राजा को पुत्र की प्राप्ति हो।

उनकी बात सुनकर महर्षि लोमश दो घड़ी तक ध्यानमग्न हो गए। तत्पश्चात् राजा के प्राचीन जन्म का रहस्य जानकर उन्होंने कहा- प्रजावृन्द! सुनो- राजा महीजित् पूर्वजन्म में मनुष्यों से गलत तरीकों से धन कमाने वाला धनहीन वैश्य था। यह वैश्य गांव-गांव घूमकर व्यापार किया करता था। एक दिन जेठ के शुक्ल पक्ष में दशमी तिथि को, जब दोपहर का सूर्य तप रहा था, वह गांव की सीमा में एक जलाशय पर पहुंचा। पानी से भरी हुई बावडी देखकर वैश्य ने वहां जल पीने का विचार किया। इतने ही में वहाँ बछड़े के साथ एक गाय भी आ पहुंची। यह प्यास से व्याकुल और ताप से पीड़ित थी; अतः बावडी में जाकर जल पीने लगी। वैश्य ने पानी पीती हुई गाय को हांककर दूर हटा दिया और स्वयं पानी पीया। उसी पाप-कर्म के कारण राजा इस समय पुत्रहीन हुए हैं। किसी जन्म के – पुण्य से इन्हें अकण्टक राज्य की प्राप्ति हुई है।’

प्रजाओं ने कहा- मुने! पुराण में सुना जाता है, कि प्रायश्चित्त रूप पुण्य से पाप नष्ट होता है; अतः पुण्य का न उपदेश कीजिये, जिससे उस पाप का नाश हो जाय।

लोमश जी बोले- प्रजाजनो! श्रावण मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी होती है, यह ‘पुत्रदा के नाम से विख्यात है। वह मनोवांछित फल प्रदान करने वाली है। तुम लोग उसी का व्रत करो।

यह सुनकर प्रजाओं ने मुनि को नमस्कार किया और – नगर में आकर विधिपूर्वक पुत्रदा एकादशी के व्रत का अनुष्ठान किया। उन्होंने विधिपूर्वक जागरण भी किया और उसका निर्मल पुण्य राजा को दे दिया। तत्पश्चात् रानी ने गर्भ धारण किया और प्रसव का समय आने पर बलवान् पुत्र को जन्म दिया।

इसका माहात्म्य सुनकर मनुष्य पाप से मुक्त हो जाता है तथा इहलोक में सुख पाकर परलोक में स्वर्गीय गति को प्राप्त होता है।

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