आचार्य अनिल जी अपने इस विशेष आलेख में बताते है कि भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी (Parivartini Ekadashi) कहा जाता है। वर्ष 2026 में यह व्रत 22 सितंबर, मंगलवार को रखा जा रहा है। इस एकादशी को भारतवर्ष के अलग-अलग क्षेत्रों और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग नामों से भी जाना जाता है: जैसे पार्श्व एकादशी (Parsva Ekadashi), वामन एकादशी (Vamana Ekadashi),पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi) आदि।
- पार्श्व एकादशी (Parsva Ekadashi): ऐसा माना जाता है कि चातुर्मास में भगवान विष्णु शयन करते है। चातुर्मास में योगनिद्रा में लीन भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट (पार्श्व) बदलते हैं, इसलिए इसे पार्श्व एकादशी या परिवर्तिनी एकादशी कहते हैं।
- वामन एकादशी (Vamana Ekadashi): इस एकादशी के दिन भगवान विष्णु के ‘वामन अवतार’ की पूजा की जाती है।
- पद्मा एकादशी (Padma Ekadashi): धार्मिक ग्रंथों में इसे पद्मा एकादशी नाम से भी संबोधित किया गया है।
- जयंती एकादशी (Jayanti Ekadashi): पापों का नाश कर विजय और मुक्ति दिलाने के कारण इसे जयंती एकादशी भी कहते हैं।
- जलझूलनी एकादशी / डोल ग्यारस (Jaljhulani Ekadashi/Dol Gyaras): राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे क्षेत्रों में इस दिन ठाकुर जी (भगवान विष्णु/कृष्ण) को पालकी में बैठाकर जलाशय पर स्नान कराने ले जाया जाता है, इसलिए इसे स्थानीय रूप से यह नाम दिया गया है
परिवर्तिनी/पद्मा एकादशी का महत्व
इस परिवर्तिनी एकादशी को पद्मा एकादशी या वामन एकादशी भी कहते हैं।
मान्यता है कि चातुर्मास में योगनिद्रा में लेटे भगवान विष्णु इस दिन अपनी करवट बदलते हैं।
इस दिन भगवान विष्णु के वामन अवतार की पूजा की जाती है।
अगर आप पूजा की विधि या कथा के बारे में जानना चाहते हैं, तो कृपया हमें बताएं।
नोट : वर्ष 2026 में परिवर्तिनी एकादशी (पार्श्व एकादशी) का मुख्य व्रत 22 सितंबर 2026, मंगलवार को रखा जाएगा।
तिथि और मुहूर्त
एकादशी तिथि प्रारंभ: 21 सितंबर 2026 की रात 08:00 बजे से
एकादशी तिथि समाप्त: 22 सितंबर 2026 की रात 09:43 बजे तक
व्रत पारण का समय (23 सितंबर 2026, बुधवार): सुबह 06:10 बजे से सुबह 08:35 बजे के बीच
परिवर्तिनी एकादशी व्रत कथा
परिवर्तिनी एकादशी की पौराणिक कथा भगवान विष्णु के वामन अवतार और राजा बलि की कथा से जुड़ी है, जिसे www.bhagyaniti.com पर विस्तार से पढ़ा जा सकता है। पौराणिक कथा के अनुसार, त्रेता युग में राजा बलि नाम का एक दैत्य था। बलि का जन्म असुर कुल में हुआ था, लेकिन वह अत्यंत दानशील, सत्यवादी और भगवान विष्णु का परम भक्त था। अपनी भक्ति और पुण्य कर्मों के प्रभाव से उसने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया और देवराज इंद्र को भी युद्ध में पराजित कर दिया।
राजा बलि से हार जाने के बाद इंद्र और अन्य सभी देवता भयभीत होकर भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे और अपनी रक्षा की गुहार लगाई। देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान विष्णु ने वामन (बौने ब्राह्मण) रूप धारण किया। भगवान वामन ने राजा बलि के पास जाकर भिक्षा में केवल तीन कदम (पग) भूमि दान में मांगी। राजा बलि का स्वभाव दानी था, तो उसने बिना सोचे-समझे यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। इसके बाद भगवान वामन ने अत्यंत विशाल रूप धारण कर लिया और पहले पग में भगवान ने पूरी पृथ्वी नाप ली। दूसरे पग में आकाश और स्वर्गलोक को ढंक लिया। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान नहीं बचा, तब वचनों से बंधे दानी राजा बलि ने अपना सिर आगे कर दिया और कहा कि तीसरा पग उनके मस्तक पर रखें।
राजा बलि की इस वचनबद्धता और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान वामन ने उसे पाताल लोक (अधोलोक) का स्वामी बना दिया और उसे वरदान दिया कि वे क्षीरसागर में शेषनाग पर सोते हुए भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन करवट बदलेंगे। यही कारण है कि इस तिथि को परिवर्तिनी एकादशी (या पार्श्व/पद्मा एकादशी) कहा जाता है।
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